1) माँ
गुलाबी खड़िया—गीली।
रूई के फोहे—
इतने बारीक
कि रंग बन जाएँ
घी के दीये से उतारा हुआ काजल...
चित्रकार एक बेटा
सुनाई देने लगी—
माँ की आवाज़
तस्वीर नहीं दिख रही
मधुमक्खी के छत्ते से निकाला प्रोपोलिस
गुलाब के तेल में घोला—
लेपन कर दिया
(माँ ने मुझे जन्म दिया है कभी नहीं मरने को)
रवि कुमार जैन
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गुलाबी खड़िया—गीली।
मोर के चटकीले सफ़ेद रंग।
रूई के फोहे—
इतने बारीक
कि रंग बन जाएँ,
घी के दीये से उतारा हुआ काजल...
उसकी बोलती हुई सुंदरता के लिए।
मधुमक्खी के छत्ते से मिला प्रोपोलिस
गुलाब के तेल में घोलकर—
पोत दूँगा उसे।
(माँ ने घर लीप दिया है)
देने को
इतनी ही अमरता है मेरे पास।
न संख्याएँ, न शोषक, न काँटे रखूँगा
उसकी पल्लवित दुनिया में।
रवि कुमार जैन
2) गर्भ-समाधि
छन-छन करता
नीला पानी—
उतर रहा है
गोद में
एक धातुई ठनक के साथ।
माँ के गर्भ में
पुनः प्रतिष्ठित—
(एक गहरी, स्थिर अनिमेष निद्रा)
[जैसे सिद्ध—
अतल आकाश में
स्थिर हैं]
इतनी गहन शांति...
एक अनाम ‘गर्भ-समाधि’।
बाहर तभी आएँगे
जब माँ पुकारेगी—
लाओत्से की तरह...
आँचल के
गीलेपन के लिए।


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