स्वबोध-स्वजगतबोध ध्यान
स्वयं को ज्ञान के प्रकाश के रूप में कल्पित करें। शरीर के आकार को अपना आकार न मानें। यह ज्ञान का प्रकाश बिना आकार, बिना रंग और बिना किसी रूप का है।
यह कोई बाहरी या भौतिक रोशनी नहीं है। यह ज्ञान है। ज्ञान को प्रकाश कहा गया है, और पूर्ण ज्ञान, केवलज्ञान, को पूर्ण प्रकाश माना गया है।
भाव करें -
"मैं ज्ञान का प्रकाश हूँ। मैं आकार-रहित हूँ, रंग-रहित हूँ। यह शरीर मेरा आकार नहीं है।"
अपनी दुनिया को पहचानें-
"यह मेरी दुनिया नहीं है। मेरी दुनिया में न आकार है, न संख्याएँ हैं, न अक्षर हैं। न कोई शासक है, न कोई शोषित। "
जब तक हो सके, ज्ञान-पुंज बने रहें।
यह अभ्यास केवल बैठकर नहीं, दिन भर चलते-फिरते भी याद रखने के लिए है।
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