हृदय-केंद्र पर प्रकाश का ध्यान
ध्यान की विधि:
अब अपना ध्यान हृदय के केंद्र में ले जाएँ। वहाँ एक शुद्ध, उज्ज्वल और शांत प्रकाश की कल्पना करें।
इस प्रकाश का अर्थ:
यह कोई भौतिक या बाहरी प्रकाश नहीं है। यह आपकी अपनी आत्मा के ज्ञान-गुण और शुद्धता का प्रतीक है। जैन दर्शन में ज्ञान को प्रकाश कहा गया है, और पूर्ण ज्ञान यानी केवलज्ञान को पूर्ण प्रकाश माना गया है।
प्रकाश का आकार:
ध्यान की शुरुआत में मन को टिकाने के लिए आप कोई भी आकार चुन सकते हैं:
- छोटी स्थिर ज्योति, दीपक की लौ जैसी
- गोल प्रकाश-मंडल, उगते सूर्य या पूर्णिमा के चंद्रमा जैसा
- पूरे शरीर में फैला प्रकाश
कोई आकार सही या गलत नहीं है। जो सहज लगे, वही लें। अभ्यास बढ़ने पर इस प्रकाश को धीरे-धीरे पूरे शरीर में फैलने दें। गहरे स्तर पर आकार की कल्पना भी छोड़ दें और केवल यह अनुभव करें: "मैं जानने-देखने वाला हूँ।" यही रूपातीत ध्यान है।
एक ज़रूरी बात:
आत्मा का वास्तविक स्वरूप अरूपी है। उसका कोई रूप, रंग या आकृति नहीं होती। इसलिए प्रकाश और उसका आकार केवल एक आलंबन (सहारा) है, आत्मा का असली स्वरूप नहीं।
साधक के लिए भाव:
कल्पना के सहारे इस प्रकाश को अपने भीतर अनुभव करें और यह भाव रखें:
"यह प्रकाश मेरी आत्मा का ही स्वभाव है। यह मुझसे बाहर नहीं, मेरे भीतर ही है।"
सारांश:
ध्यान में कल्पित प्रकाश और उसका आकार आत्मा के ज्ञान का प्रतीक है। कल्पना केवल एक सहारा है, जिसके माध्यम से साधक अपनी आत्मा के निर्मल, निराकार स्वरूप को पहचानने का प्रयास करता है।