Wednesday, October 28, 2026

/z/ articulation

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दांत को आपसे में मिलाकर डी बोलो 



Tuesday, October 13, 2026

नई कविता (रवि कुमार जैन) ☑

 PKM1) उत्तर- इस समय का 

उत्तर बदलते रहते हैं — 
जैसे मौसम। 
जैसे नींद में देखे गए सपने।  

कभी लगता था — 
मैं शरीर हूँ।  

अब लगता है — 
मैं कोई छाया हूँ, या धीमा-सा कोई प्रकाश।  

आपके प्रश्न का
इस समय मेरा उत्तर है— 
लम्हे को शब्दों में विस्तारित करना — 
कविता है।  

रवि कुमार जैन 



PKM2) नीली रेखाएँ

मेरे चेहरे पर
खुदी हुई थीं नीली रेखाएँ
जिसे
इरेजर ने मिटा दी

अब ठंडे काँच की तरह मेरे चेहरे पर
एक बच्चा रखता है उँगली
और पहुँच जाता है दूसरी दुनिया में

जहाँ मिटा दी गयीं हैं सारी रेखाएँ
एक सफ़ेद कोरा कैनवास
चिड़ियों के पंख की तरह
फड़फड़ा रहा है
उस दुनिया में

एक भारी भूरा पल्ला लटक गया है
एक तरफ़
दरवाज़े को
धिक्कारता हुआ।

रवि कुमार जैन​



PKM3) 


नई कविता (रवि कुमार जैन)

 1) माँ


गुलाबी खड़िया—गीली।

रूई के फोहे—

इतने बारीक

कि रंग बन जाएँ

घी के दीये से उतारा हुआ काजल...

चित्रकार एक बेटा 


सुनाई देने लगी—

माँ की आवाज़ 


तस्वीर नहीं दिख रही 


मधुमक्खी के छत्ते से निकाला प्रोपोलिस

गुलाब के तेल में घोला—

लेपन कर दिया 

(माँ ने मुझे जन्म दिया है कभी नहीं मरने को)


रवि कुमार जैन

----------

गुलाबी खड़िया—गीली।
मोर के चटकीले सफ़ेद रंग।

रूई के फोहे—
इतने बारीक
कि रंग बन जाएँ,
घी के दीये से उतारा हुआ काजल...
उसकी बोलती हुई सुंदरता के लिए।

मधुमक्खी के छत्ते से मिला प्रोपोलिस
गुलाब के तेल में घोलकर—
पोत दूँगा उसे।
(माँ ने घर लीप दिया है)

देने को
इतनी ही अमरता है मेरे पास।

न संख्याएँ, न शोषक, न काँटे रखूँगा
उसकी पल्लवित दुनिया में।

रवि कुमार जैन 


2) गर्भ-समाधि

छन-छन करता 
नीला पानी—
        उतर रहा है 
        गोद में
        एक धातुई ठनक के साथ।


माँ के गर्भ में
पुनः प्रतिष्ठित—
(एक गहरी, स्थिर अनिमेष निद्रा)

        [जैसे सिद्ध— 
         अतल आकाश में 
         स्थिर हैं]


इतनी गहन शांति... 
एक अनाम ‘गर्भ-समाधि’।


बाहर तभी आएँगे
जब माँ पुकारेगी—
लाओत्से की तरह...

            आँचल के
            गीलेपन के लिए।

रवि कुमार जैन 


3) 

Tuesday, October 6, 2026

स्वबोध-स्वजगतबोध ध्यान (रवि कुमार जैन)

स्वबोध-स्वजगतबोध ध्यान 

स्वयं को ज्ञान के प्रकाश के रूप में कल्पित करें। शरीर के आकार को अपना आकार न मानें। यह ज्ञान का प्रकाश बिना आकार, बिना रंग और बिना किसी रूप का है।

यह कोई बाहरी या भौतिक रोशनी नहीं है। यह ज्ञान है। ज्ञान को प्रकाश कहा गया है, और पूर्ण ज्ञान, केवलज्ञान, को पूर्ण प्रकाश माना गया है।

भाव करें -

"मैं ज्ञान का प्रकाश हूँ। मैं आकार-रहित हूँ, रंग-रहित हूँ। यह शरीर मेरा आकार नहीं है।"

अपनी दुनिया को पहचानें-

"यह मेरी दुनिया नहीं है। मेरी दुनिया में न आकार है, न संख्याएँ हैं, न अक्षर हैं। न कोई शासक है, न कोई शोषित। "

जब तक हो सके, ज्ञान-पुंज बने रहें। 

यह अभ्यास केवल बैठकर नहीं, दिन भर चलते-फिरते भी याद रखने के लिए है।

Monday, October 5, 2026

ध्यानम

 

हृदय-केंद्र पर प्रकाश का ध्यान 

ध्यान की विधि:
अब अपना ध्यान हृदय के केंद्र में ले जाएँ। वहाँ एक शुद्ध, उज्ज्वल और शांत प्रकाश की कल्पना करें।

इस प्रकाश का अर्थ:
यह कोई भौतिक या बाहरी प्रकाश नहीं है। यह आपकी अपनी आत्मा के ज्ञान-गुण और शुद्धता का प्रतीक है। जैन दर्शन में ज्ञान को प्रकाश कहा गया है, और पूर्ण ज्ञान यानी केवलज्ञान को पूर्ण प्रकाश माना गया है।

प्रकाश का आकार:
ध्यान की शुरुआत में मन को टिकाने के लिए आप कोई भी आकार चुन सकते हैं:

  • छोटी स्थिर ज्योति, दीपक की लौ जैसी
  • गोल प्रकाश-मंडल, उगते सूर्य या पूर्णिमा के चंद्रमा जैसा
  • पूरे शरीर में फैला प्रकाश

कोई आकार सही या गलत नहीं है। जो सहज लगे, वही लें। अभ्यास बढ़ने पर इस प्रकाश को धीरे-धीरे पूरे शरीर में फैलने दें। गहरे स्तर पर आकार की कल्पना भी छोड़ दें और केवल यह अनुभव करें: "मैं जानने-देखने वाला हूँ।" यही रूपातीत ध्यान है।

एक ज़रूरी बात:
आत्मा का वास्तविक स्वरूप अरूपी है। उसका कोई रूप, रंग या आकृति नहीं होती। इसलिए प्रकाश और उसका आकार केवल एक आलंबन (सहारा) है, आत्मा का असली स्वरूप नहीं।

साधक के लिए भाव:
कल्पना के सहारे इस प्रकाश को अपने भीतर अनुभव करें और यह भाव रखें:

"यह प्रकाश मेरी आत्मा का ही स्वभाव है। यह मुझसे बाहर नहीं, मेरे भीतर ही है।"

सारांश:
ध्यान में कल्पित प्रकाश और उसका आकार आत्मा के ज्ञान का प्रतीक है। कल्पना केवल एक सहारा है, जिसके माध्यम से साधक अपनी आत्मा के निर्मल, निराकार स्वरूप को पहचानने का प्रयास करता है।