Friday, September 18, 2026

निसर्गदत्त महाराज (Nisargadatta Maharaj): Author of I Am That

आप सभी भीग गए हो क्योंकि आपकी दुनिया में हमेशा तेज बारिश होती 

है। मेरी दुनिया में हमेशा अच्छा मौसम रहता है। वहां ना रात है, 

ना दिन, ना गर्मी है, ना ठंड। मुझे वहां कोई चिंता नहीं सताती।


मेरा मन विचारों से मुक्त है क्योंकि वहां कोई इच्छा नहीं है 

जिन्हें पूरा करने के लिए मैं गुलाम बनूं। आपकी दुनिया अस्थाई 

और परिवर्तनशील है। मेरी दुनिया पूर्ण और अपरिवर्तनीय है। आप 

अपनी दुनिया के बारे में मुझे कुछ भी बता सकते हो। मैं ध्यान से 

सुनूंगा भी, शायद रुचि भी रखूंगा। लेकिन एक पल के लिए भी मैं यह 

नहीं भूलूंगा कि आपकी दुनिया वास्तव में नहीं है। आप सपना देख 

रहे हो।


मेरी दुनिया का ऐसा कोई आकार, रूप या रेखा नहीं है जिससे इसे 

पहचाना जा सके। आप इसके बारे में कुछ नहीं कह सकते हो। बस मैं 

हूं का शाश्वत भाव। बस यही मेरी दुनिया है। यह संपन्न और संपूर्ण 

दुनिया है। मैं हूं। हर छाप यहां मिट चुकी है। हर अनुभव अस्वीकार 

किया जा चुका है। मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। यहां तक कि मैं भी 

नहीं चाहिए क्योंकि मैं खुद को कभी खो ही नहीं सकता हूं। तो फिर 

चाहने की भावना कहां?


आपकी दुनिया में संघर्ष है। लेकिन मेरी दुनिया में शाश्वत मौन 

है। मेरा मौन गाता है। मेरा खालीपन भरा हुआ है। मुझे किसी चीज 

की कमी नहीं है। आप मेरी दुनिया को तब तक नहीं जान सकते जब तक 

आप यहां खुद नहीं आ जाते।


आपने पूछा कि क्या मैं अपनी दुनिया में अकेला हूं? यह शब्द लागू 

ही नहीं होता है। तो आप अकेला या ना अकेला कैसे कह सकते हो? 

बेशक मैं अकेला हूं क्योंकि मैं का भाव ही सब कुछ है।


मेरी दुनिया में ना आना है ना जाना। यह तो केवल शब्द है। मैं 

कहां से जाऊंगा और कहां से आऊंगा। आप अपनी दुनिया पर अधिक ध्यान 

दें। इसे सावधानी से जांचे और अचानक एक दिन आप खुद को मेरी 

दुनिया में पाओगे। लेकिन आपको वहां भी कुछ हासिल नहीं होगा। आप 

सिर्फ जो आपका नहीं है उसे छोड़ दोगे, और जो आपने कभी नहीं खोया 

अपना वह असली अस्तित्व, उसे आप जांच पाओगे, जान पाओगे।


मेरी दुनिया में ना कोई शासक है ना कोई शासित। यहां कोई द्वैत्य 

नहीं है। मतलब यहां कुछ भी दूसरा नहीं है। बस एक ही है। मैं हूं 

का शुद्ध शाश्वत अनुभव।


आपकी दुनिया के शासकों की धारणा केवल आपकी अपनी कल्पना है। आपके 

शास्त्र और देवता यहां कोई अर्थ नहीं रखते। आपकी दुनिया में मैं 

एक नाम, एक आकार और एक गतिविधि प्रदर्शित करता हुआ दिखता हूं। 

पर मेरी दुनिया में मैं केवल शुद्ध अस्तित्व हूं और कुछ नहीं। 

आपकी संपत्ति और गुणों के बारे में धारणा आपको अमीर होने की 

कल्पना देती है। मैं पूरी तरह से इन कल्पनाओं से मुक्त हूं। अपनी 

दुनिया को वैसे देखें जैसी वह वास्तव में है, ना कि जैसी आपने 

कल्पना कर रखी है।


यह समझदारी ही आपको वैराग्य (डिटैचमेंट) की ओर ले जाएगी। वैराग्य 

आपसे सही साधना और सही कर्म कराएगा। सही साधना और सही कर्म 

आपके वास्तविक अस्तित्व तक एक आंतरिक पुल का निर्माण करेगा। सही 

साधना आपके समर्पण का प्रमाण है। जो आपको कहा गया है उसे मेहनत 

और विश्वास श्रद्धा के साथ करें, और मार्ग की सभी बाधाएं विलुप्त 

हो जाएंगी।


अगर मैं आपकी दुनिया में होता तो सबसे ज्यादा दुखी हो जाता। 

खाने के लिए उठना, फिर बातें करना और फिर से सो जाना। क्या 

झंझट है। जीना और मरना, यह दोनों कितने निरर्थक शब्द हैं। जब 

आप मुझे जीवित देखते हो, मैं मृत हूं। और जब आप सोचते हो कि मैं 

मृत हूं, मैं जीवित हूं। आप कितने उलझे हुए हो।


आपकी समस्याओं के बारे में मुझे कुछ भी नहीं करना है। वे आती 

हैं और खुद ही चली जाती हैं। चाहे समस्या शारीरिक हो, भावनात्मक 

हो या मानसिक हो, यह हमेशा व्यक्तिगत होती है। बड़ी कुदरती 

आपदाएं असंख्य व्यक्तिगत नियतियों का योग हैं और उन्हें सुलझाने 

में समय लगता है। लेकिन मृत्यु कोई आपदा नहीं है।


आपकी दुनिया और मेरी दुनिया के बीच किसी पुल की आवश्यकता नहीं 

है, जैसे वास्तविक और काल्पनिक दुनिया के बीच किसी कड़ी की 

आवश्यकता नहीं होती है। क्योंकि ऐसा कोई पुल हो ही नहीं सकता जो 

वास्तविक को काल्पनिक के साथ जोड़ दे। सिर्फ वास्तविक है, 

काल्पनिक नहीं है। आपकी गलती आपके इस विश्वास में है कि आपका 

जन्म हुआ है, बल्कि आपका जन्म कभी हुआ ही नहीं है, ना आप कभी 

मरोगे। लेकिन आप मानते हो कि आपका जन्म किसी निश्चित तारीख और 

स्थान पर हुआ था और एक विशेष शरीर ही आपका अपना है।


अपनी दुनिया की जांच करें। अपने मन को इसमें लगाएं। इसे सावधानी 

से देखें। हर विचार की गहराई से जांच करें। यही पर्याप्त है।


मेरा अनुभव है कि सब कुछ आनंद है। लेकिन आनंद की इच्छा वही दर्द 

उत्पन्न करती है। इसी तरह आनंद दर्द का बीज बन जाता है। सारे 

दुखों का ब्रह्मांड इच्छा से उत्पन्न होता है। तो सुख की इच्छा 

छोड़ दें और आप दर्द को जान भी नहीं पाओगे।


आप दुनिया की चिंता क्यों करते हो जबकि पहले खुद की देखभाल करना 

सीखना चाहिए? आप दुनिया को बचाना चाहते हो, है ना? क्या आप खुद 

को बचाए बिना दुनिया को बचा सकते हो? और बचाना मतलब क्या? भ्रम 

से बचना। मृत्यु का अर्थ है चीजों को वैसे देखो जैसी वह है।


मैं वास्तव में अपने आप को किसी भी चीज से संबंधित नहीं देखता 

हूं। यहां तक कि मैं, मैं से भी संबंधित नहीं हूं। यह मैं, यह 

स्वयं चाहे कुछ भी हो, पर मैं सदैव अपरिभाषित रहता हूं। मुझे 

सच में खुद को किसी से भी या किसी चीज से भी संबंधित नहीं बनना 

है, यहां तक कि खुद से भी नहीं, चाहे वह स्वयं कुछ भी हो। मैं 

हमेशा अपरिभाषित रहता हूं। मैं भीतर हूं और भीतर के बाहर भी हूं। 

मैं अनगढ़ हूं। मैं निजी हूं और पहुंच से भी परे हूं।


अपने गुरु में विश्वास के कारण मैं यहां तक पहुंचा। उन्होंने 

मुझसे कहा कि केवल तुम हो, और मैंने उन पर शक नहीं किया। मैं 

बस इसे समझने की कोशिश करता रहा, जब तक मैंने यह महसूस नहीं 

किया कि यही पूर्ण सत्य है कि मैं हूं।


आत्म साक्षात्कार के बारे में मैंने पाया कि मैं चैतन्य हूं और 

पूर्ण रूप से आनंदित हूं। और यह केवल मेरी गलती थी कि मैंने 

सोचा कि मेरा अस्तित्व, चेतना और आनंद मेरे शरीर और दुनिया भर 

के शरीरों पर निर्भर है।


मेरे गुरु ने मुझे हर चीज पर पूरी तरह से शक करना सिखाया। 

उन्होंने कहा कि अपने अस्तित्व को छोड़कर हर चीज को अस्वीकार 

कर दो। इच्छा के माध्यम से आपने इस दुनिया को इसके सुख और दुख 

के साथ बना दिया है। आप जिसे सुख कहते हो वह सुख सीमित और 

अस्थाई होता है। दुख से ही सुख की इच्छा उत्पन्न होती है और यह 

इच्छा अपनी पूर्ति की तलाश करती रहती है और निराशा और हताशा के 

दर्द में समाप्त भी हो जाती है। सुख के पीछे हमेशा दुख छिपा 

होता है, और सभी सुख की खोज दुख से शुरू होती है और दुख में ही 

समाप्त हो जाती है।


इससे क्या फर्क पड़ता है कि आपका मन सुस्त है या अशांत है? यह 

मन ही है जो सुस्त है या अशांत है, आप नहीं हो। देखें, इस कमरे 

में कई चीजें हो रही हैं। क्या मैंने इन्हें होने के लिए कहा है? 

वे बस हो रही हैं। आपके साथ भी ऐसा ही है। नियति खुद को प्रकट 

कर रही है, और जो निश्चित है उसे साकार कर देती है। आप घटनाओं 

के क्रम को नहीं बदल सकते, लेकिन आप अपना दृष्टिकोण बदल सकते हो, 

और जो वास्तव में मायने रखता है वह दृष्टिकोण है, ना कि घटनाएं।


दुनिया इच्छाओं और भय का जन्मस्थान है। आप इसमें शांति नहीं पा 

सकते। शांति के लिए आपको दुनिया से परे जाना होगा। दुनिया की 

जड़ झूठे मैं और झूठे मैं के प्रेम में है, मतलब अहंकार में है। 

इसी कारण हम सुख चाहते हैं और दुख से बचते हैं। अहंकार को आत्मा 

के प्रेम से बदलें और पूरी तस्वीर बदल जाएगी।


एक दिन ऐसा आएगा जब आपने पर्याप्त ज्ञान इकट्ठा कर लिया होगा और 

आपको आत्मनिर्माण शुरू करना होगा। तब हर एक चीज को छांटें और जो 

बिल्कुल जरूरी है उसे ही रखें। हर चीज की गहराई से जांच करें और 

जो गैर जरूरी है उसे निर्दयता के साथ नष्ट कर दें। ऐसा कभी नहीं 

होगा कि आपने ज्यादा चीजें नष्ट कर दीं, मुझ पर विश्वास रखें। 

क्योंकि वास्तविकता में किसी चीज का कोई वास्तविक मूल्य नहीं 

है। बस वैराग्य के प्रति अपना राग रखें। मैं हूं की शाश्वत भाव 

में स्थापित रहें।


और फिर एक दिन आएगा जब आप उससे भी परे चले जाओगे — वैराग्य से 

भी परे। और इस दुनिया में कोई बारिश नहीं है। यहां कोई दिन या 

रात नहीं है। यहां हमेशा अच्छा मौसम है। यही "मैं हूं" का 

शाश्वत भाव है।

निसर्गदत्त महाराज (Nisargadatta Maharaj)

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मेरा जोड़ना (महाराज से माफ़ी के साथ)

मेरी दुनिया में संख्याएँ और अक्षर हैं ही नहीं इसलिए मुझे वेतन के आँकड़े या ग्रेडिंग के आँकड़े से अंतर नहीं पड़ता है। 

मेरी दुनिया में मेरा कोई बॉस या सबऑर्डिनेट नहीं है|

मैं न मीटिंग में कुछ पाने या खोने को उपस्थित होता हूँ.


Wednesday, September 2, 2026

जैन समुच्चय पूजा (कवि श्री वृन्दावनदास) Jain Samuchchaya Puja (Kavi Shri Vrindavandas)

कवि श्री वृन्दावनदास

(समुच्चय चौबीसी पूजा Samuccaya Caubīsī Pūjā)


(पूजन विधि निर्देश)


(छन्द चौबोला)

ऋषभ अजित संभव अभिनंदन, सुमति पदम सुपार्श्व जिनराय |

चंद पुहुप शीतल श्रेयांस-जिन, वासुपूज्य पूजित-सुरराय |

विमल अनंत धरम जस-उज्ज्वल, शांति कुंथु अर मल्लि मनाय |

मुनिसुव्रत नमि नेमि पार्श्वप्रभु, वर्द्धमान पद-पुष्प चढ़ाय ||


ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-जिनसमूह! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट्! (इति आह्वानानम्)

ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-जिनसमूह! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ:! (इति स्थापनम्)

ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-जिनसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (इति सन्निधिकरणम्)


मुनिमन-सम उज्ज्वल नीर, प्रासुक गन्ध भरा |

भरि कनक-कटोरी धीर, दीनी धार धरा ||

चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।१।


गोशीर कपूर मिलाय, केशर-रंग भरी |

जिन-चरनन देत चढ़ाय, भव-आताप हरी ||

चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो भवताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।२।


तंदुल सित सोम-समान, सुन्दर अनियारे |

मुक्ताफल की उनमान, पुञ्ज धरूं प्यारे ||

चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।३।


वरकंज कदंब कुरंड, सुमन सुगंध भरे |

जिन-अग्र धरूं गुणमंड, काम-कलंक हरे ||

चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।४।


मनमोदन मोदक आदि, सुन्दर सद्य बने |

रसपूरित प्रासुक स्वाद, जजत क्षुधादि हने ||

चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।५।


तमखंडन दीप जगाय, धारूं तुम आगे |

सब तिमिर-मोह क्षय जाय, ज्ञान-कला जागे ||

चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।६।


दशगंध हुताशन-माँहि, हे प्रभु खेवत हूँ |

मिस धूम करम जरि जाँहि, तुम पद सेवत हूँ ||

चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।७।


शुचि-पक्व-सरस-फल सार, सब ऋतु के ल्यायो |

देखत दृग-मन को प्यार, पूजत सुख पायो ||

चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।८।


जल-फल आठों शुचिसार, ताको अर्घ करूं |

तुमको अरपूं भवतार, भव तरि मोक्ष वरूं ||

चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।९।


(दोहा)

श्रीमत तीरथनाथ पद, माथ नाय हित-हेत |

गाऊँ गुणमाला अबै, अजर अमर पद देत ||


(त्रिभंगी छन्द)

जय भवतम-भंजन जन-मन-कंजन, रंजन दिनमनि स्वच्छकरा |

शिवमग-परकाशक, अरिगण-नाशक, चौबीसों जिनराजवरा ||


(छन्द पद्धरि)

जय ऋषभदेव ऋषिगन नमंत, जय अजित जीत वसु-अरि तुरंत |

जय संभव भव-भय करत चूर, जय अभिनंदन आनंदपूर ||१||


जय सुमति सुमति-दायक दयाल, जय पद्म पद्मद्युति तनरसाल |

जय-जय सुपार्श्व भव-पास नाश, जय चंद्र चंद्र-तन-द्युति प्रकाश ||२||


जय पुष्पदंत द्युति-दंत सेत, जय शीतल शीतल गुन-निकेत |

जय श्रेयनाथ नुत-सहसभुज्ज, जय वासवपूजित वासुपुज्ज ||३||


जय विमल विमल-पद देनहार, जय जय अनंत गुन-गन अपार |

जय धर्म धर्म शिव-शर्म देत, जय शांति शांति-पुष्टी करेत ||४||


जय कुंथु कुंथु-आदिक रखेय, जय अरजिन वसु-अरि क्षय करेय |

जय मल्लि मल्ल हत मोह-मल्ल, जय मुनिसुव्रत व्रत-शल्ल-दल्ल ||५||


जय नमि नित वासव-नुत सपेम, जय नेमिनाथ वृष-चक्र-नेम |

जय पारसनाथ अनाथ-नाथ, जय वर्द्धमान शिव-नगर साथ ||६||


(त्रिभंगी छन्द)

चौबीस जिनंदा आनंद-कंदा, पाप-निकंदा सुखकारी |

तिन पद-जुग-चंदा उदय अमंदा, वासव-वंदा हितकारी ||

ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-चतुर्विंशतिजिनेभ्यो जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।


(सोरठा छन्द)

भुक्ति-मुक्ति दातार, चौबीसों जिनराजवर |

तिन-पद मन-वच-धार, जो पूजे सो शिव लहे ||


।।इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत्।।

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कवि श्री वृन्दावनदास


(पूजन विधि निर्देश)


(छन्द चौबोला)

ऋषभ अजित संभव अभिनंदन, सुमति पदम सुपार्श्व जिनराय |

अर्थ: ऋषभ, अजित, संभव, अभिनंदन, सुमति, पद्मप्रभु, सुपार्श्व — इन जिनेश्वरों को नमन।


चंद पुहुप शीतल श्रेयांस-जिन, वासुपूज्य पूजित-सुरराय |

अर्थ: चंद्रप्रभु, सुविधिनाथ (पुष्पदंत), शीतलनाथ, श्रेयांसनाथ, वासुपूज्य — जिन्हें देवराज भी पूजते हैं।


विमल अनंत धरम जस-उज्ज्वल, शांति कुंथु अर मल्लि मनाय |

अर्थ: विमलनाथ, अनंतनाथ, धर्मनाथ जिनकी कीर्ति उज्ज्वल है, शांतिनाथ, कुंथुनाथ और मल्लिनाथ का ध्यान करें।


मुनिसुव्रत नमि नेमि पार्श्वप्रभु, वर्द्धमान पद-पुष्प चढ़ाय ||

अर्थ: मुनिसुव्रत, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और वर्धमान (महावीर) के चरणों में पुष्प चढ़ाएं।


ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-जिनसमूह! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट्! (इति आह्वानानम्)

अर्थ: हे चौबीस जिनेश्वरों के समूह! यहाँ अवतरित हों, अवतरित हों — यह आह्वान मंत्र है।


ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-जिनसमूह! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ:! (इति स्थापनम्)

अर्थ: हे चौबीस जिनेश्वरों के समूह! यहाँ स्थिर रहें, स्थिर रहें — यह स्थापना मंत्र है।


ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-जिनसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (इति सन्निधिकरणम्)

अर्थ: हे चौबीस जिनेश्वरों के समूह! मेरे समीप उपस्थित हों — यह सन्निधिकरण मंत्र है।


मुनिमन-सम उज्ज्वल नीर, प्रासुक गन्ध भरा |

अर्थ: मुनियों के मन जैसा निर्मल जल, जिसमें शुद्ध सुगंध भरी है।


भरि कनक-कटोरी धीर, दीनी धार धरा ||

अर्थ: स्वर्ण-कटोरी में भरकर, धैर्यपूर्वक जलधारा अर्पित करता हूँ।


चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।


पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।


ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।१।

अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को जन्म-जरा-मृत्यु के नाश हेतु जल अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (जल-पूजा मंत्र)


गोशीर कपूर मिलाय, केशर-रंग भरी |

अर्थ: चंदन और कपूर मिलाकर, केसर के रंग से भरा हुआ।


जिन-चरनन देत चढ़ाय, भव-आताप हरी ||

अर्थ: जिनेश्वर के चरणों में चढ़ाकर संसार का ताप दूर करता हूँ।


चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।


पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।


ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो भवताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।२।

अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को संसार-ताप के नाश हेतु चंदन अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (चंदन-पूजा मंत्र)


तंदुल सित सोम-समान, सुन्दर अनियारे |

अर्थ: चंद्रमा के समान श्वेत, सुंदर और चमकीले चावल।


मुक्ताफल की उनमान, पुञ्ज धरूं प्यारे ||

अर्थ: मोतियों के समान इनका ढेर प्रेमपूर्वक अर्पित करता हूँ।


चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।


पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।


ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।३।

अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को अक्षय पद प्राप्ति हेतु अक्षत (चावल) अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (अक्षत-पूजा मंत्र)


वरकंज कदंब कुरंड, सुमन सुगंध भरे |

अर्थ: श्रेष्ठ कमल, कदंब, कुरंड आदि सुगंधित पुष्प।


जिन-अग्र धरूं गुणमंड, काम-कलंक हरे ||

अर्थ: जिनेश्वर के सामने गुणों से सुशोभित यह पुष्प रखता हूँ, जो काम-वासना का कलंक हरता है।


चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।


पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।


ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।४।

अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को काम-बाण के विध्वंस हेतु पुष्प अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (पुष्प-पूजा मंत्र)


मनमोदन मोदक आदि, सुन्दर सद्य बने |

अर्थ: मन को प्रसन्न करने वाले मोदक आदि अभी-अभी बनाए गए सुंदर पकवान।


रसपूरित प्रासुक स्वाद, जजत क्षुधादि हने ||

अर्थ: रसयुक्त शुद्ध स्वाद वाले, इनकी पूजा भूख आदि (शारीरिक पीड़ा) को नष्ट करती है।


चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।


पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।


ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।५।

अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को क्षुधा-रोग के नाश हेतु नैवेद्य अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (नैवेद्य-पूजा मंत्र)


तमखंडन दीप जगाय, धारूं तुम आगे |

अर्थ: अंधकार को नष्ट करने वाला दीपक जलाकर आपके सामने रखता हूँ।


सब तिमिर-मोह क्षय जाय, ज्ञान-कला जागे ||

अर्थ: इससे सारा अंधकार और मोह नष्ट हो जाए, ज्ञान की कला जागृत हो।


चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।


पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।


ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।६।

अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को मोह-अंधकार के नाश हेतु दीप अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (दीप-पूजा मंत्र)


दशगंध हुताशन-माँहि, हे प्रभु खेवत हूँ |

अर्थ: हे प्रभु, दस प्रकार की सुगंधित धूप अग्नि में अर्पित कर रहा हूँ।


मिस धूम करम जरि जाँहि, तुम पद सेवत हूँ ||

अर्थ: इस धूम्र के बहाने मेरे कर्म जल जाएं, मैं आपके चरणों की सेवा करता हूँ।


चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।


पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।


ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।७।

अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को आठ कर्मों के दहन हेतु धूप अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (धूप-पूजा मंत्र)


शुचि-पक्व-सरस-फल सार, सब ऋतु के ल्यायो |

अर्थ: शुद्ध, पके हुए, रसीले श्रेष्ठ फल, जो सभी ऋतुओं से लाए गए हैं।


देखत दृग-मन को प्यार, पूजत सुख पायो ||

अर्थ: देखने पर आंख-मन को प्रिय लगते हैं, इनकी पूजा से सुख मिलता है।


चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।


पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।


ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।८।

अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को मोक्ष-फल की प्राप्ति हेतु फल अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (फल-पूजा मंत्र)


जल-फल आठों शुचिसार, ताको अर्घ करूं |

अर्थ: जल से फल तक के आठों शुद्ध द्रव्यों को मिलाकर अर्घ्य चढ़ाता हूँ।


तुमको अरपूं भवतार, भव तरि मोक्ष वरूं ||

अर्थ: आपको यह अर्पित करता हूँ ताकि संसार-सागर तरकर मोक्ष प्राप्त करूं।


चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |

अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।


पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||

अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।


ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।९।

अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को अनर्घ्य (अमूल्य) पद की प्राप्ति हेतु अर्घ्य अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (अर्घ्य-पूजा मंत्र — यह आठों द्रव्यों की समापन-पूजा है)


(दोहा)

श्रीमत तीरथनाथ पद, माथ नाय हित-हेत |

अर्थ: तीर्थंकर भगवान के चरणों में कल्याण हेतु मस्तक झुकाकर।


गाऊँ गुणमाला अबै, अजर अमर पद देत ||

अर्थ: अब उनकी गुणमाला (जयमाला) गाता हूँ, जो अजर-अमर पद (मोक्ष) प्रदान करती है।


(त्रिभंगी छन्द)

जय भवतम-भंजन जन-मन-कंजन, रंजन दिनमनि स्वच्छकरा |

अर्थ: जय हो, संसार-अंधकार के नाशक, लोगों के मन को प्रफुल्लित करने वाले, सूर्य के समान स्वच्छ-प्रकाशक।


शिवमग-परकाशक, अरिगण-नाशक, चौबीसों जिनराजवरा ||

अर्थ: मोक्ष-मार्ग के प्रकाशक, शत्रुओं (कर्मों) के नाशक — ऐसे चौबीसों जिनराज की जय हो।


(छन्द पद्धरि)

जय ऋषभदेव ऋषिगन नमंत, जय अजित जीत वसु-अरि तुरंत |

अर्थ: जय ऋषभदेव, जिन्हें ऋषिगण नमन करते हैं; जय अजितनाथ, जिन्होंने आठ कर्म-शत्रुओं को शीघ्र जीता।


जय संभव भव-भय करत चूर, जय अभिनंदन आनंदपूर ||१||

अर्थ: जय संभवनाथ, जो संसार के भय को चूर करते हैं; जय अभिनंदननाथ, जो आनंद से परिपूर्ण हैं।


जय सुमति सुमति-दायक दयाल, जय पद्म पद्मद्युति तनरसाल |

अर्थ: जय सुमतिनाथ, जो सद्बुद्धि देने वाले दयालु हैं; जय पद्मप्रभु, जिनकी देह-कांति कमल जैसी है।


जय-जय सुपार्श्व भव-पास नाश, जय चंद्र चंद्र-तन-द्युति प्रकाश ||२||

अर्थ: जय-जय सुपार्श्वनाथ, जो संसार-बंधन का नाश करते हैं; जय चंद्रप्रभु, जिनकी देह की कांति चंद्रमा जैसी प्रकाशमान है।


जय पुष्पदंत द्युति-दंत सेत, जय शीतल शीतल गुन-निकेत |

अर्थ: जय पुष्पदंत (सुविधिनाथ), जिनके दांत श्वेत-चमकीले हैं; जय शीतलनाथ, जो शीतल गुणों के धाम हैं।


जय श्रेयनाथ नुत-सहसभुज्ज, जय वासवपूजित वासुपुज्ज ||३||

अर्थ: जय श्रेयांसनाथ, जिन्हें सहस्रों भुजाओं वाले (इंद्रादि) नमन करते हैं; जय वासुपूज्य, जो इंद्र द्वारा पूजित हैं।


जय विमल विमल-पद देनहार, जय जय अनंत गुन-गन अपार |

अर्थ: जय विमलनाथ, जो निर्मल पद देने वाले हैं; जय-जय अनंतनाथ, जिनके गुण अपार हैं।


जय धर्म धर्म शिव-शर्म देत, जय शांति शांति-पुष्टी करेत ||४||

अर्थ: जय धर्मनाथ, जो धर्म द्वारा मोक्ष-सुख देते हैं; जय शांतिनाथ, जो शांति और पुष्टि प्रदान करते हैं।


जय कुंथु कुंथु-आदिक रखेय, जय अरजिन वसु-अरि क्षय करेय |

अर्थ: जय कुंथुनाथ, जो सूक्ष्म जीवों तक की रक्षा करते हैं; जय अरनाथ, जो आठ कर्म-शत्रुओं का क्षय करते हैं।


जय मल्लि मल्ल हत मोह-मल्ल, जय मुनिसुव्रत व्रत-शल्ल-दल्ल ||५||

अर्थ: जय मल्लिनाथ, जिन्होंने मोह-रूपी मल्ल (पहलवान) को हराया; जय मुनिसुव्रतनाथ, जो व्रत से कांटों (दोषों) को नष्ट करते हैं।


जय नमि नित वासव-नुत सपेम, जय नेमिनाथ वृष-चक्र-नेम |

अर्थ: जय नमिनाथ, जिन्हें इंद्र सदा प्रेमपूर्वक नमन करता है; जय नेमिनाथ, धर्म-चक्र की धुरी।


जय पारसनाथ अनाथ-नाथ, जय वर्द्धमान शिव-नगर साथ ||६||

अर्थ: जय पार्श्वनाथ, जो अनाथों के नाथ हैं; जय वर्धमान (महावीर), जो मोक्ष-नगर तक साथ ले जाते हैं।


(त्रिभंगी छन्द)

चौबीस जिनंदा आनंद-कंदा, पाप-निकंदा सुखकारी |

अर्थ: चौबीस जिनेंद्र आनंद के मूल, पाप का समूल नाश करने वाले, सुख देने वाले हैं।


तिन पद-जुग-चंदा उदय अमंदा, वासव-वंदा हितकारी ||

अर्थ: उनके चरण-युगल चंद्रमा के समान सदा उदित रहते हैं, इंद्र द्वारा वंदित और हितकारी हैं।


ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-चतुर्विंशतिजिनेभ्यो जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अर्थ: ऋषभदेव आदि चौबीस जिनेश्वरों को जयमाला का पूर्ण अर्घ्य अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (जयमाला की पूर्णाहुति मंत्र)


(सोरठा छन्द)

भुक्ति-मुक्ति दातार, चौबीसों जिनराजवर |

अर्थ: चौबीसों श्रेष्ठ जिनराज भोग और मोक्ष दोनों देने वाले हैं।


तिन-पद मन-वच-धार, जो पूजे सो शिव लहे ||

अर्थ: जो कोई मन-वचन से उनके चरणों को धारण कर पूजा करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है।


।।इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत्।।

अर्थ: इस प्रकार आशीर्वाद स्वरूप पुष्पांजलि अर्पित करें।