कवि श्री वृन्दावनदास
(समुच्चय चौबीसी पूजा Samuccaya Caubīsī Pūjā)
(पूजन विधि निर्देश)
(छन्द चौबोला)
ऋषभ अजित संभव अभिनंदन, सुमति पदम सुपार्श्व जिनराय |
चंद पुहुप शीतल श्रेयांस-जिन, वासुपूज्य पूजित-सुरराय |
विमल अनंत धरम जस-उज्ज्वल, शांति कुंथु अर मल्लि मनाय |
मुनिसुव्रत नमि नेमि पार्श्वप्रभु, वर्द्धमान पद-पुष्प चढ़ाय ||
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-जिनसमूह! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट्! (इति आह्वानानम्)
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-जिनसमूह! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ:! (इति स्थापनम्)
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-जिनसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (इति सन्निधिकरणम्)
मुनिमन-सम उज्ज्वल नीर, प्रासुक गन्ध भरा |
भरि कनक-कटोरी धीर, दीनी धार धरा ||
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।१।
गोशीर कपूर मिलाय, केशर-रंग भरी |
जिन-चरनन देत चढ़ाय, भव-आताप हरी ||
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो भवताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।२।
तंदुल सित सोम-समान, सुन्दर अनियारे |
मुक्ताफल की उनमान, पुञ्ज धरूं प्यारे ||
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।३।
वरकंज कदंब कुरंड, सुमन सुगंध भरे |
जिन-अग्र धरूं गुणमंड, काम-कलंक हरे ||
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।४।
मनमोदन मोदक आदि, सुन्दर सद्य बने |
रसपूरित प्रासुक स्वाद, जजत क्षुधादि हने ||
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।५।
तमखंडन दीप जगाय, धारूं तुम आगे |
सब तिमिर-मोह क्षय जाय, ज्ञान-कला जागे ||
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।६।
दशगंध हुताशन-माँहि, हे प्रभु खेवत हूँ |
मिस धूम करम जरि जाँहि, तुम पद सेवत हूँ ||
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।७।
शुचि-पक्व-सरस-फल सार, सब ऋतु के ल्यायो |
देखत दृग-मन को प्यार, पूजत सुख पायो ||
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।८।
जल-फल आठों शुचिसार, ताको अर्घ करूं |
तुमको अरपूं भवतार, भव तरि मोक्ष वरूं ||
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।९।
(दोहा)
श्रीमत तीरथनाथ पद, माथ नाय हित-हेत |
गाऊँ गुणमाला अबै, अजर अमर पद देत ||
(त्रिभंगी छन्द)
जय भवतम-भंजन जन-मन-कंजन, रंजन दिनमनि स्वच्छकरा |
शिवमग-परकाशक, अरिगण-नाशक, चौबीसों जिनराजवरा ||
(छन्द पद्धरि)
जय ऋषभदेव ऋषिगन नमंत, जय अजित जीत वसु-अरि तुरंत |
जय संभव भव-भय करत चूर, जय अभिनंदन आनंदपूर ||१||
जय सुमति सुमति-दायक दयाल, जय पद्म पद्मद्युति तनरसाल |
जय-जय सुपार्श्व भव-पास नाश, जय चंद्र चंद्र-तन-द्युति प्रकाश ||२||
जय पुष्पदंत द्युति-दंत सेत, जय शीतल शीतल गुन-निकेत |
जय श्रेयनाथ नुत-सहसभुज्ज, जय वासवपूजित वासुपुज्ज ||३||
जय विमल विमल-पद देनहार, जय जय अनंत गुन-गन अपार |
जय धर्म धर्म शिव-शर्म देत, जय शांति शांति-पुष्टी करेत ||४||
जय कुंथु कुंथु-आदिक रखेय, जय अरजिन वसु-अरि क्षय करेय |
जय मल्लि मल्ल हत मोह-मल्ल, जय मुनिसुव्रत व्रत-शल्ल-दल्ल ||५||
जय नमि नित वासव-नुत सपेम, जय नेमिनाथ वृष-चक्र-नेम |
जय पारसनाथ अनाथ-नाथ, जय वर्द्धमान शिव-नगर साथ ||६||
(त्रिभंगी छन्द)
चौबीस जिनंदा आनंद-कंदा, पाप-निकंदा सुखकारी |
तिन पद-जुग-चंदा उदय अमंदा, वासव-वंदा हितकारी ||
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-चतुर्विंशतिजिनेभ्यो जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(सोरठा छन्द)
भुक्ति-मुक्ति दातार, चौबीसों जिनराजवर |
तिन-पद मन-वच-धार, जो पूजे सो शिव लहे ||
।।इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत्।।
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कवि श्री वृन्दावनदास
(पूजन विधि निर्देश)
(छन्द चौबोला)
ऋषभ अजित संभव अभिनंदन, सुमति पदम सुपार्श्व जिनराय |
अर्थ: ऋषभ, अजित, संभव, अभिनंदन, सुमति, पद्मप्रभु, सुपार्श्व — इन जिनेश्वरों को नमन।
चंद पुहुप शीतल श्रेयांस-जिन, वासुपूज्य पूजित-सुरराय |
अर्थ: चंद्रप्रभु, सुविधिनाथ (पुष्पदंत), शीतलनाथ, श्रेयांसनाथ, वासुपूज्य — जिन्हें देवराज भी पूजते हैं।
विमल अनंत धरम जस-उज्ज्वल, शांति कुंथु अर मल्लि मनाय |
अर्थ: विमलनाथ, अनंतनाथ, धर्मनाथ जिनकी कीर्ति उज्ज्वल है, शांतिनाथ, कुंथुनाथ और मल्लिनाथ का ध्यान करें।
मुनिसुव्रत नमि नेमि पार्श्वप्रभु, वर्द्धमान पद-पुष्प चढ़ाय ||
अर्थ: मुनिसुव्रत, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और वर्धमान (महावीर) के चरणों में पुष्प चढ़ाएं।
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-जिनसमूह! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट्! (इति आह्वानानम्)
अर्थ: हे चौबीस जिनेश्वरों के समूह! यहाँ अवतरित हों, अवतरित हों — यह आह्वान मंत्र है।
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-जिनसमूह! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ:! (इति स्थापनम्)
अर्थ: हे चौबीस जिनेश्वरों के समूह! यहाँ स्थिर रहें, स्थिर रहें — यह स्थापना मंत्र है।
ॐ ह्रीं श्री चतुर्विंशति-जिनसमूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (इति सन्निधिकरणम्)
अर्थ: हे चौबीस जिनेश्वरों के समूह! मेरे समीप उपस्थित हों — यह सन्निधिकरण मंत्र है।
मुनिमन-सम उज्ज्वल नीर, प्रासुक गन्ध भरा |
अर्थ: मुनियों के मन जैसा निर्मल जल, जिसमें शुद्ध सुगंध भरी है।
भरि कनक-कटोरी धीर, दीनी धार धरा ||
अर्थ: स्वर्ण-कटोरी में भरकर, धैर्यपूर्वक जलधारा अर्पित करता हूँ।
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।१।
अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को जन्म-जरा-मृत्यु के नाश हेतु जल अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (जल-पूजा मंत्र)
गोशीर कपूर मिलाय, केशर-रंग भरी |
अर्थ: चंदन और कपूर मिलाकर, केसर के रंग से भरा हुआ।
जिन-चरनन देत चढ़ाय, भव-आताप हरी ||
अर्थ: जिनेश्वर के चरणों में चढ़ाकर संसार का ताप दूर करता हूँ।
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो भवताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।२।
अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को संसार-ताप के नाश हेतु चंदन अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (चंदन-पूजा मंत्र)
तंदुल सित सोम-समान, सुन्दर अनियारे |
अर्थ: चंद्रमा के समान श्वेत, सुंदर और चमकीले चावल।
मुक्ताफल की उनमान, पुञ्ज धरूं प्यारे ||
अर्थ: मोतियों के समान इनका ढेर प्रेमपूर्वक अर्पित करता हूँ।
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।३।
अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को अक्षय पद प्राप्ति हेतु अक्षत (चावल) अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (अक्षत-पूजा मंत्र)
वरकंज कदंब कुरंड, सुमन सुगंध भरे |
अर्थ: श्रेष्ठ कमल, कदंब, कुरंड आदि सुगंधित पुष्प।
जिन-अग्र धरूं गुणमंड, काम-कलंक हरे ||
अर्थ: जिनेश्वर के सामने गुणों से सुशोभित यह पुष्प रखता हूँ, जो काम-वासना का कलंक हरता है।
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।४।
अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को काम-बाण के विध्वंस हेतु पुष्प अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (पुष्प-पूजा मंत्र)
मनमोदन मोदक आदि, सुन्दर सद्य बने |
अर्थ: मन को प्रसन्न करने वाले मोदक आदि अभी-अभी बनाए गए सुंदर पकवान।
रसपूरित प्रासुक स्वाद, जजत क्षुधादि हने ||
अर्थ: रसयुक्त शुद्ध स्वाद वाले, इनकी पूजा भूख आदि (शारीरिक पीड़ा) को नष्ट करती है।
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।५।
अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को क्षुधा-रोग के नाश हेतु नैवेद्य अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (नैवेद्य-पूजा मंत्र)
तमखंडन दीप जगाय, धारूं तुम आगे |
अर्थ: अंधकार को नष्ट करने वाला दीपक जलाकर आपके सामने रखता हूँ।
सब तिमिर-मोह क्षय जाय, ज्ञान-कला जागे ||
अर्थ: इससे सारा अंधकार और मोह नष्ट हो जाए, ज्ञान की कला जागृत हो।
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो मोहांधकार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।६।
अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को मोह-अंधकार के नाश हेतु दीप अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (दीप-पूजा मंत्र)
दशगंध हुताशन-माँहि, हे प्रभु खेवत हूँ |
अर्थ: हे प्रभु, दस प्रकार की सुगंधित धूप अग्नि में अर्पित कर रहा हूँ।
मिस धूम करम जरि जाँहि, तुम पद सेवत हूँ ||
अर्थ: इस धूम्र के बहाने मेरे कर्म जल जाएं, मैं आपके चरणों की सेवा करता हूँ।
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।७।
अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को आठ कर्मों के दहन हेतु धूप अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (धूप-पूजा मंत्र)
शुचि-पक्व-सरस-फल सार, सब ऋतु के ल्यायो |
अर्थ: शुद्ध, पके हुए, रसीले श्रेष्ठ फल, जो सभी ऋतुओं से लाए गए हैं।
देखत दृग-मन को प्यार, पूजत सुख पायो ||
अर्थ: देखने पर आंख-मन को प्रिय लगते हैं, इनकी पूजा से सुख मिलता है।
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।८।
अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को मोक्ष-फल की प्राप्ति हेतु फल अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (फल-पूजा मंत्र)
जल-फल आठों शुचिसार, ताको अर्घ करूं |
अर्थ: जल से फल तक के आठों शुद्ध द्रव्यों को मिलाकर अर्घ्य चढ़ाता हूँ।
तुमको अरपूं भवतार, भव तरि मोक्ष वरूं ||
अर्थ: आपको यह अर्पित करता हूँ ताकि संसार-सागर तरकर मोक्ष प्राप्त करूं।
चौबीसों श्री जिनचंद, आनंद-कंद सही |
अर्थ: चौबीसों जिनेश्वर सचमुच आनंद के मूल स्रोत हैं।
पद-जजत हरत भवफंद, पावत मोक्ष मही ||
अर्थ: उनके चरणों की पूजा संसार-बंधन को हरती है और मोक्ष प्राप्त कराती है।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-वीरांतेभ्यो अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।९।
अर्थ: ऋषभदेव से महावीर तक के जिनेश्वरों को अनर्घ्य (अमूल्य) पद की प्राप्ति हेतु अर्घ्य अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (अर्घ्य-पूजा मंत्र — यह आठों द्रव्यों की समापन-पूजा है)
(दोहा)
श्रीमत तीरथनाथ पद, माथ नाय हित-हेत |
अर्थ: तीर्थंकर भगवान के चरणों में कल्याण हेतु मस्तक झुकाकर।
गाऊँ गुणमाला अबै, अजर अमर पद देत ||
अर्थ: अब उनकी गुणमाला (जयमाला) गाता हूँ, जो अजर-अमर पद (मोक्ष) प्रदान करती है।
(त्रिभंगी छन्द)
जय भवतम-भंजन जन-मन-कंजन, रंजन दिनमनि स्वच्छकरा |
अर्थ: जय हो, संसार-अंधकार के नाशक, लोगों के मन को प्रफुल्लित करने वाले, सूर्य के समान स्वच्छ-प्रकाशक।
शिवमग-परकाशक, अरिगण-नाशक, चौबीसों जिनराजवरा ||
अर्थ: मोक्ष-मार्ग के प्रकाशक, शत्रुओं (कर्मों) के नाशक — ऐसे चौबीसों जिनराज की जय हो।
(छन्द पद्धरि)
जय ऋषभदेव ऋषिगन नमंत, जय अजित जीत वसु-अरि तुरंत |
अर्थ: जय ऋषभदेव, जिन्हें ऋषिगण नमन करते हैं; जय अजितनाथ, जिन्होंने आठ कर्म-शत्रुओं को शीघ्र जीता।
जय संभव भव-भय करत चूर, जय अभिनंदन आनंदपूर ||१||
अर्थ: जय संभवनाथ, जो संसार के भय को चूर करते हैं; जय अभिनंदननाथ, जो आनंद से परिपूर्ण हैं।
जय सुमति सुमति-दायक दयाल, जय पद्म पद्मद्युति तनरसाल |
अर्थ: जय सुमतिनाथ, जो सद्बुद्धि देने वाले दयालु हैं; जय पद्मप्रभु, जिनकी देह-कांति कमल जैसी है।
जय-जय सुपार्श्व भव-पास नाश, जय चंद्र चंद्र-तन-द्युति प्रकाश ||२||
अर्थ: जय-जय सुपार्श्वनाथ, जो संसार-बंधन का नाश करते हैं; जय चंद्रप्रभु, जिनकी देह की कांति चंद्रमा जैसी प्रकाशमान है।
जय पुष्पदंत द्युति-दंत सेत, जय शीतल शीतल गुन-निकेत |
अर्थ: जय पुष्पदंत (सुविधिनाथ), जिनके दांत श्वेत-चमकीले हैं; जय शीतलनाथ, जो शीतल गुणों के धाम हैं।
जय श्रेयनाथ नुत-सहसभुज्ज, जय वासवपूजित वासुपुज्ज ||३||
अर्थ: जय श्रेयांसनाथ, जिन्हें सहस्रों भुजाओं वाले (इंद्रादि) नमन करते हैं; जय वासुपूज्य, जो इंद्र द्वारा पूजित हैं।
जय विमल विमल-पद देनहार, जय जय अनंत गुन-गन अपार |
अर्थ: जय विमलनाथ, जो निर्मल पद देने वाले हैं; जय-जय अनंतनाथ, जिनके गुण अपार हैं।
जय धर्म धर्म शिव-शर्म देत, जय शांति शांति-पुष्टी करेत ||४||
अर्थ: जय धर्मनाथ, जो धर्म द्वारा मोक्ष-सुख देते हैं; जय शांतिनाथ, जो शांति और पुष्टि प्रदान करते हैं।
जय कुंथु कुंथु-आदिक रखेय, जय अरजिन वसु-अरि क्षय करेय |
अर्थ: जय कुंथुनाथ, जो सूक्ष्म जीवों तक की रक्षा करते हैं; जय अरनाथ, जो आठ कर्म-शत्रुओं का क्षय करते हैं।
जय मल्लि मल्ल हत मोह-मल्ल, जय मुनिसुव्रत व्रत-शल्ल-दल्ल ||५||
अर्थ: जय मल्लिनाथ, जिन्होंने मोह-रूपी मल्ल (पहलवान) को हराया; जय मुनिसुव्रतनाथ, जो व्रत से कांटों (दोषों) को नष्ट करते हैं।
जय नमि नित वासव-नुत सपेम, जय नेमिनाथ वृष-चक्र-नेम |
अर्थ: जय नमिनाथ, जिन्हें इंद्र सदा प्रेमपूर्वक नमन करता है; जय नेमिनाथ, धर्म-चक्र की धुरी।
जय पारसनाथ अनाथ-नाथ, जय वर्द्धमान शिव-नगर साथ ||६||
अर्थ: जय पार्श्वनाथ, जो अनाथों के नाथ हैं; जय वर्धमान (महावीर), जो मोक्ष-नगर तक साथ ले जाते हैं।
(त्रिभंगी छन्द)
चौबीस जिनंदा आनंद-कंदा, पाप-निकंदा सुखकारी |
अर्थ: चौबीस जिनेंद्र आनंद के मूल, पाप का समूल नाश करने वाले, सुख देने वाले हैं।
तिन पद-जुग-चंदा उदय अमंदा, वासव-वंदा हितकारी ||
अर्थ: उनके चरण-युगल चंद्रमा के समान सदा उदित रहते हैं, इंद्र द्वारा वंदित और हितकारी हैं।
ॐ ह्रीं श्री ऋषभादि-चतुर्विंशतिजिनेभ्यो जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
अर्थ: ऋषभदेव आदि चौबीस जिनेश्वरों को जयमाला का पूर्ण अर्घ्य अर्पित करता हूँ, स्वाहा। (जयमाला की पूर्णाहुति मंत्र)
(सोरठा छन्द)
भुक्ति-मुक्ति दातार, चौबीसों जिनराजवर |
अर्थ: चौबीसों श्रेष्ठ जिनराज भोग और मोक्ष दोनों देने वाले हैं।
तिन-पद मन-वच-धार, जो पूजे सो शिव लहे ||
अर्थ: जो कोई मन-वचन से उनके चरणों को धारण कर पूजा करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है।
।।इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत्।।
अर्थ: इस प्रकार आशीर्वाद स्वरूप पुष्पांजलि अर्पित करें।
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