आप सभी भीग गए हो क्योंकि आपकी दुनिया में हमेशा तेज बारिश होती
है। मेरी दुनिया में हमेशा अच्छा मौसम रहता है। वहां ना रात है,
ना दिन, ना गर्मी है, ना ठंड। मुझे वहां कोई चिंता नहीं सताती।
मेरा मन विचारों से मुक्त है क्योंकि वहां कोई इच्छा नहीं है
जिन्हें पूरा करने के लिए मैं गुलाम बनूं। आपकी दुनिया अस्थाई
और परिवर्तनशील है। मेरी दुनिया पूर्ण और अपरिवर्तनीय है। आप
अपनी दुनिया के बारे में मुझे कुछ भी बता सकते हो। मैं ध्यान से
सुनूंगा भी, शायद रुचि भी रखूंगा। लेकिन एक पल के लिए भी मैं यह
नहीं भूलूंगा कि आपकी दुनिया वास्तव में नहीं है। आप सपना देख
रहे हो।
मेरी दुनिया का ऐसा कोई आकार, रूप या रेखा नहीं है जिससे इसे
पहचाना जा सके। आप इसके बारे में कुछ नहीं कह सकते हो। बस मैं
हूं का शाश्वत भाव। बस यही मेरी दुनिया है। यह संपन्न और संपूर्ण
दुनिया है। मैं हूं। हर छाप यहां मिट चुकी है। हर अनुभव अस्वीकार
किया जा चुका है। मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। यहां तक कि मैं भी
नहीं चाहिए क्योंकि मैं खुद को कभी खो ही नहीं सकता हूं। तो फिर
चाहने की भावना कहां?
आपकी दुनिया में संघर्ष है। लेकिन मेरी दुनिया में शाश्वत मौन
है। मेरा मौन गाता है। मेरा खालीपन भरा हुआ है। मुझे किसी चीज
की कमी नहीं है। आप मेरी दुनिया को तब तक नहीं जान सकते जब तक
आप यहां खुद नहीं आ जाते।
आपने पूछा कि क्या मैं अपनी दुनिया में अकेला हूं? यह शब्द लागू
ही नहीं होता है। तो आप अकेला या ना अकेला कैसे कह सकते हो?
बेशक मैं अकेला हूं क्योंकि मैं का भाव ही सब कुछ है।
मेरी दुनिया में ना आना है ना जाना। यह तो केवल शब्द है। मैं
कहां से जाऊंगा और कहां से आऊंगा। आप अपनी दुनिया पर अधिक ध्यान
दें। इसे सावधानी से जांचे और अचानक एक दिन आप खुद को मेरी
दुनिया में पाओगे। लेकिन आपको वहां भी कुछ हासिल नहीं होगा। आप
सिर्फ जो आपका नहीं है उसे छोड़ दोगे, और जो आपने कभी नहीं खोया
अपना वह असली अस्तित्व, उसे आप जांच पाओगे, जान पाओगे।
मेरी दुनिया में ना कोई शासक है ना कोई शासित। यहां कोई द्वैत्य
नहीं है। मतलब यहां कुछ भी दूसरा नहीं है। बस एक ही है। मैं हूं
का शुद्ध शाश्वत अनुभव।
आपकी दुनिया के शासकों की धारणा केवल आपकी अपनी कल्पना है। आपके
शास्त्र और देवता यहां कोई अर्थ नहीं रखते। आपकी दुनिया में मैं
एक नाम, एक आकार और एक गतिविधि प्रदर्शित करता हुआ दिखता हूं।
पर मेरी दुनिया में मैं केवल शुद्ध अस्तित्व हूं और कुछ नहीं।
आपकी संपत्ति और गुणों के बारे में धारणा आपको अमीर होने की
कल्पना देती है। मैं पूरी तरह से इन कल्पनाओं से मुक्त हूं। अपनी
दुनिया को वैसे देखें जैसी वह वास्तव में है, ना कि जैसी आपने
कल्पना कर रखी है।
यह समझदारी ही आपको वैराग्य (डिटैचमेंट) की ओर ले जाएगी। वैराग्य
आपसे सही साधना और सही कर्म कराएगा। सही साधना और सही कर्म
आपके वास्तविक अस्तित्व तक एक आंतरिक पुल का निर्माण करेगा। सही
साधना आपके समर्पण का प्रमाण है। जो आपको कहा गया है उसे मेहनत
और विश्वास श्रद्धा के साथ करें, और मार्ग की सभी बाधाएं विलुप्त
हो जाएंगी।
अगर मैं आपकी दुनिया में होता तो सबसे ज्यादा दुखी हो जाता।
खाने के लिए उठना, फिर बातें करना और फिर से सो जाना। क्या
झंझट है। जीना और मरना, यह दोनों कितने निरर्थक शब्द हैं। जब
आप मुझे जीवित देखते हो, मैं मृत हूं। और जब आप सोचते हो कि मैं
मृत हूं, मैं जीवित हूं। आप कितने उलझे हुए हो।
आपकी समस्याओं के बारे में मुझे कुछ भी नहीं करना है। वे आती
हैं और खुद ही चली जाती हैं। चाहे समस्या शारीरिक हो, भावनात्मक
हो या मानसिक हो, यह हमेशा व्यक्तिगत होती है। बड़ी कुदरती
आपदाएं असंख्य व्यक्तिगत नियतियों का योग हैं और उन्हें सुलझाने
में समय लगता है। लेकिन मृत्यु कोई आपदा नहीं है।
आपकी दुनिया और मेरी दुनिया के बीच किसी पुल की आवश्यकता नहीं
है, जैसे वास्तविक और काल्पनिक दुनिया के बीच किसी कड़ी की
आवश्यकता नहीं होती है। क्योंकि ऐसा कोई पुल हो ही नहीं सकता जो
वास्तविक को काल्पनिक के साथ जोड़ दे। सिर्फ वास्तविक है,
काल्पनिक नहीं है। आपकी गलती आपके इस विश्वास में है कि आपका
जन्म हुआ है, बल्कि आपका जन्म कभी हुआ ही नहीं है, ना आप कभी
मरोगे। लेकिन आप मानते हो कि आपका जन्म किसी निश्चित तारीख और
स्थान पर हुआ था और एक विशेष शरीर ही आपका अपना है।
अपनी दुनिया की जांच करें। अपने मन को इसमें लगाएं। इसे सावधानी
से देखें। हर विचार की गहराई से जांच करें। यही पर्याप्त है।
मेरा अनुभव है कि सब कुछ आनंद है। लेकिन आनंद की इच्छा वही दर्द
उत्पन्न करती है। इसी तरह आनंद दर्द का बीज बन जाता है। सारे
दुखों का ब्रह्मांड इच्छा से उत्पन्न होता है। तो सुख की इच्छा
छोड़ दें और आप दर्द को जान भी नहीं पाओगे।
आप दुनिया की चिंता क्यों करते हो जबकि पहले खुद की देखभाल करना
सीखना चाहिए? आप दुनिया को बचाना चाहते हो, है ना? क्या आप खुद
को बचाए बिना दुनिया को बचा सकते हो? और बचाना मतलब क्या? भ्रम
से बचना। मृत्यु का अर्थ है चीजों को वैसे देखो जैसी वह है।
मैं वास्तव में अपने आप को किसी भी चीज से संबंधित नहीं देखता
हूं। यहां तक कि मैं, मैं से भी संबंधित नहीं हूं। यह मैं, यह
स्वयं चाहे कुछ भी हो, पर मैं सदैव अपरिभाषित रहता हूं। मुझे
सच में खुद को किसी से भी या किसी चीज से भी संबंधित नहीं बनना
है, यहां तक कि खुद से भी नहीं, चाहे वह स्वयं कुछ भी हो। मैं
हमेशा अपरिभाषित रहता हूं। मैं भीतर हूं और भीतर के बाहर भी हूं।
मैं अनगढ़ हूं। मैं निजी हूं और पहुंच से भी परे हूं।
अपने गुरु में विश्वास के कारण मैं यहां तक पहुंचा। उन्होंने
मुझसे कहा कि केवल तुम हो, और मैंने उन पर शक नहीं किया। मैं
बस इसे समझने की कोशिश करता रहा, जब तक मैंने यह महसूस नहीं
किया कि यही पूर्ण सत्य है कि मैं हूं।
आत्म साक्षात्कार के बारे में मैंने पाया कि मैं चैतन्य हूं और
पूर्ण रूप से आनंदित हूं। और यह केवल मेरी गलती थी कि मैंने
सोचा कि मेरा अस्तित्व, चेतना और आनंद मेरे शरीर और दुनिया भर
के शरीरों पर निर्भर है।
मेरे गुरु ने मुझे हर चीज पर पूरी तरह से शक करना सिखाया।
उन्होंने कहा कि अपने अस्तित्व को छोड़कर हर चीज को अस्वीकार
कर दो। इच्छा के माध्यम से आपने इस दुनिया को इसके सुख और दुख
के साथ बना दिया है। आप जिसे सुख कहते हो वह सुख सीमित और
अस्थाई होता है। दुख से ही सुख की इच्छा उत्पन्न होती है और यह
इच्छा अपनी पूर्ति की तलाश करती रहती है और निराशा और हताशा के
दर्द में समाप्त भी हो जाती है। सुख के पीछे हमेशा दुख छिपा
होता है, और सभी सुख की खोज दुख से शुरू होती है और दुख में ही
समाप्त हो जाती है।
इससे क्या फर्क पड़ता है कि आपका मन सुस्त है या अशांत है? यह
मन ही है जो सुस्त है या अशांत है, आप नहीं हो। देखें, इस कमरे
में कई चीजें हो रही हैं। क्या मैंने इन्हें होने के लिए कहा है?
वे बस हो रही हैं। आपके साथ भी ऐसा ही है। नियति खुद को प्रकट
कर रही है, और जो निश्चित है उसे साकार कर देती है। आप घटनाओं
के क्रम को नहीं बदल सकते, लेकिन आप अपना दृष्टिकोण बदल सकते हो,
और जो वास्तव में मायने रखता है वह दृष्टिकोण है, ना कि घटनाएं।
दुनिया इच्छाओं और भय का जन्मस्थान है। आप इसमें शांति नहीं पा
सकते। शांति के लिए आपको दुनिया से परे जाना होगा। दुनिया की
जड़ झूठे मैं और झूठे मैं के प्रेम में है, मतलब अहंकार में है।
इसी कारण हम सुख चाहते हैं और दुख से बचते हैं। अहंकार को आत्मा
के प्रेम से बदलें और पूरी तस्वीर बदल जाएगी।
एक दिन ऐसा आएगा जब आपने पर्याप्त ज्ञान इकट्ठा कर लिया होगा और
आपको आत्मनिर्माण शुरू करना होगा। तब हर एक चीज को छांटें और जो
बिल्कुल जरूरी है उसे ही रखें। हर चीज की गहराई से जांच करें और
जो गैर जरूरी है उसे निर्दयता के साथ नष्ट कर दें। ऐसा कभी नहीं
होगा कि आपने ज्यादा चीजें नष्ट कर दीं, मुझ पर विश्वास रखें।
क्योंकि वास्तविकता में किसी चीज का कोई वास्तविक मूल्य नहीं
है। बस वैराग्य के प्रति अपना राग रखें। मैं हूं की शाश्वत भाव
में स्थापित रहें।
और फिर एक दिन आएगा जब आप उससे भी परे चले जाओगे — वैराग्य से
भी परे। और इस दुनिया में कोई बारिश नहीं है। यहां कोई दिन या
रात नहीं है। यहां हमेशा अच्छा मौसम है। यही "मैं हूं" का
शाश्वत भाव है।
ॐ
निसर्गदत्त महाराज (Nisargadatta Maharaj)
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मेरा जोड़ना (महाराज से माफ़ी के साथ)
मेरी दुनिया में संख्याएँ और अक्षर हैं ही नहीं इसलिए मुझे वेतन के आँकड़े या ग्रेडिंग के आँकड़े से अंतर नहीं पड़ता है।
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